यह तुम्हारी वजह से मेरी मानवी मूझसे जुड़ा हो गई । तुमने मेरी मानवी को मुझे छीना है ना मैं तुम्हारे बदन की आड़ से तुम्हारी आत्मा को इतना तड़पाऊंगा की मुझसे मौत की भीख मांगे पर मौत तक नासिव होने नही दूंगा ।
ऋषि की बेदील बाते सुन पूर्णा बेबसी से सिमटी पड़ी रही रही जैसे उसे पता हो वो की वह कुछ भी बोल ले ऋषि उसकी बात का भरोसा नही करने वाला ।
पूर्णा को ज़वाब ना देता देख ऋषि पूर्णा के साथ जानवरों की तरह से सलूक करने लगा ।
पूर्णा के बदन से अपनी हवस को मिटाने लगा। पूर्णा चाह कर भी कुछ नही कर सकती थी ऋषि को उसकी मन मानी करें दे रही थी जैसे यह तो रोज का हो।
कमरा पूर्णा के दर्द से गूंज उठा रात के पहर बदलते गए पर पता नही यह शिलशिला कब ख़त्म हुआ ।
अगली सुबह




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