एक बेहद खूबसूरत लड़की, जिसके बालों से उसका चेहरा ढका हुआ था, बस उसकी थोड़ी-थोड़ी आँखें दिख रही थीं जो शराब के नशे में बेहद नशीली लग रही थीं।
वह कार से उतरकर ड्राइवर को बाय-बाय कर रही थी। वह लड़की शराब के नशे में चूर, लड़खड़ाते हुए गाना गुनगुनाते हुए अपने पर्स से फार्महाउस की चाबी निकालकर दरवाजा खोलकर अंदर चली जाती है। अंदर आते ही सबसे पहले उसने स्विच ऑन किया, जिससे खाली फार्महाउस रोशनी से जगमगा उठा।
लड़की ने स्विच ऑन करते ही दीवार से लगे आइने की ओर देखते हुए मुस्कुराते हुए कहा, "आज मैं अकेली हूँ। आज मैं सुकून से सोऊँगी। मुझे परेशान करने वाला कोई नहीं है, कोई भी नहीं, हा हा।"
अपने चेहरे पर दिलकश मुस्कुराहट लिए जैसे ही वह मुड़ी, वैसे ही वह लड़की डर से कांपने लगी और उसका सारा नशा उतर गया।
लड़की अपनी जगह पर डर से कांप रही थी, जैसे उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो। अपनी नज़रें झुकाए, वह अपनी ड्रेस को नीचे खींचने लगी।
हिम्मत जुटाकर लड़की टूटी-फूटी आवाज में बोली, "आप... आप यहाँ कब आए? आप तो 4 दिन के लिए फॉरेन कंट्री गए थे, ना?"
काउच पर किसी राजा की तरह बैठा वह शख्स, जिसके चेहरे पर बेहिसाब गुस्सा था, जिसे देखकर कोई भी डर जाए। शख्स घूरते हुए अपनी सर्द आवाज में बोला, "माउस, कम टू मी।"
आवाज इतनी खौफनाक थी कि वह लड़की डर से कांप उठी। अभी भी कुछ न देख पाकर, वह अपने बालों को पीछे करते हुए बोली, "क्या तुम्हें मेरी बात सुनाई नहीं दे रही, माउस?"
वह लड़की डरते हुए उस शख्स से थोड़ी दूरी बनाकर खड़ी हो गई।
उस शख्स ने फिर से इशारा किया। उसे समझकर वह कांपते हुए बोली, "न... नहीं, मैं यही ठीक हूं, मास्टर। लगता है तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आती।"
"तो ठीक है," वह शख्स अपनी जगह से उठकर उस नाजुक लड़की को अपनी गोद में उठा लाया और दूर से ही बेड पर फेंक दिया, जैसे उसके जीने-मरने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
वह लड़की पीठ के बल बेड पर गिर गई और दर्द से अपनी आंखें भींच लीं। बेड सामान्य बेड नहीं था; शायद जानबूझकर इसे हार्ड बनाया गया था ताकि सोने वाले को नींद न आ सके। वह खुद को संभालते हुए दर्द से पीछे खिसकने लगी।
वह शख्स गुस्से में अपनी स्लीव्स फोल्ड कर खुद भी बेड पर आ गया।
अपने पत्थर जैसे मजबूत हाथों से उस मासूम का छोटा सा जबड़ा कसते हुए उसने कहा,
"बताओ, मिसेज ऋषि पूर्णा भाटिया, किसके साथ अपना मुंह काला करके पैलेस न जाकर यहां इस सुनसान जगह पर आई हो?"
पूर्णा दत्ता आज पूरे 18-19 साल की हुई है, जो देखने में किसी गुड़िया से कम नहीं। भगवान ने जितना खूबसूरत उसे बनाया है, उतना ही खूबसूरत उसे दिल दिया है। पर कहते हैं ना, हर खूबसूरत चीज किसी बुरे इंसान के हाथ में लग जाती है। बस वही हुआ पूर्णा के साथ।
पूर्णा ने बचपन से जिसे प्यार किया, उसी ने उसकी जिंदगी तबाह कर दी।
वही ऋषि भाटिया, जो पूर्णा से 8 साल बड़ा है, जिसके लिए अब प्यार जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं बची है। वहीं करता है पूर्णा से बेहिसाब नफरत।
(हर एक चैप्टर के साथ राज खोलते जाएंगे। अब वापस आते हैं अपनी स्टोरी पर।)
पूर्णा दर्द से तड़प उठी। ऋषि का हाथ पकड़कर बोली, "ऋषि, प्लीज मुझे छोड़ो, मुझे दर्द हो रहा है।"
ऋषि दांत पीसते हुए बोला, "दर्द हो रहा है ना? बस अभी तो इतना ही दर्द है। अगर तुमने मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया, तो तुम सोच भी नहीं सकती कि आगे कितना दर्द होगा।"
"बताओ, तुम इतनी देर रात तक कहां थी? और खबरदार जो मुझसे झूठ बोलने की कोशिश की तो।"
पूर्णा अपनी टूटी-फूटी आवाज में बोली, "वो... आज मेरा बर्थडे था, इसलिए फ्रेंड्स को पार्टी के लिए हम लोग क्लब गए थे।"
"ओह, तो आज तुम्हारा बर्थडे है, माउस।"
"किसकी परमिशन से तुम गई थी? जहां तक मुझे याद है, मैंने तुम्हें तो परमिशन नहीं दी थी, फिर तुम कैसे गई?"
पूर्णा भरे गले से बोली, "मैंने आपको कॉल किया था, पर आपने कॉल रिसीव नहीं किया।"
ऋषि ने पूर्णा का गला पकड़कर कहा, "तो तुम कहना चाहती हो कि इसमें मेरी गलती है? तुम्हारी इतनी औकात है?"
यह बोलते ही ऋषि के हाथ पूर्णा के गले में कसते गए।
ऋषि पर उसका गुस्सा हावी हो रहा था। एक झटके में उसने पूर्णा की पहनी ड्रेस को देखकर गुस्से में अपनी आंखें मिच लीं और दूसरे ही पल वह ड्रेस दो टुकड़ों में फाड़ दी।
ऋषि के ऐसा करने से पूर्णा डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं, जैसे उसे पता हो कि आगे क्या होने वाला है।
"आइंदा अगर तुम्हें मैंने ऐसे कपड़ों में देखा, तो तुम सोच भी नहीं सकती कि मैं तुम्हारा क्या हाल करूंगा। और याद रखना, यह लास्ट वार्निंग है, माउस।"
"तुम्हारी आंखों में मुझे डर देखना है। तुम्हें क्या लगा कि मुझे तुम्हारे बारे में कुछ पता नहीं चलेगा? पर तुम शायद भूल रही हो कि मैं कौन हूं।"
"तुम मेरा वह खिलौना हो जो बिना मर्जी से मेरे पास आया है।"
"तुमने मेरी मानवी की जगह ली है। तुम्हें क्या लगता है, तुम मेरी मानवी की जगह ले पाओगी? यह तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है। तुमने मेरी मानवी को मुझसे छीना है। मैं तुम्हारे शरीर से तुम्हारी आत्मा को इतना तड़पाऊंगा कि तुम मुझसे मौत की भीख मांगोगी, पर मैं तुम्हें मौत भी नसीब नहीं होने दूंगा।"
ऋषि की बेदिल बातें सुनकर पूर्णा बेबस सिमटी पड़ी रही, जैसे उसे पता हो कि वह कुछ भी बोल ले, ऋषि उसकी बात का भरोसा नहीं करने वाला।
पूर्णा को जवाब न देते देख, ऋषि ने उसके साथ जानवरों की तरह सलूक करना शुरू कर दिया।
पूर्णा की बॉडी को बेपर्दा कर वह अपनी हवस मिटाने लगा। पूर्णा चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी और ऋषि को उसकी मनमानी करने दे रही थी, जैसे यह तो रोज का हो।
कमरा पूर्णा के दर्द से गूंज उठा। रात के पहर बदलते गए, पर पता नहीं यह सिलसिला कब खत्म हुआ।




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